लेखक : संतोष कुमार तिवारी (वरिष्ठ पत्रकार)
Social Media nahi Social Sense chahiye : सोशल मीडिया ने मोबाइल फोन के जरिए दुनिया को हमारी हथेली में ला दिया है। कोई घटना कहीं घटती है और कुछ ही सेकंड में उसकी तस्वीर या वीडियो लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच जाता है। सूचना, संवाद और जागरूकता के इस दौर में सोशल मीडिया एक बड़ी ताकत बन चुका है लेकिन बिहार के जमुई की घटना हमें इस ताकत के दूसरे और बेहद चिंताजनक पहलू पर सोचने के लिए मजबूर करती है। क्या सोशल मीडिया से जुड़ते-जुड़ते हम सामाजिक रूप से दूर होते जा रहे हैं?
बीते 19 सितंबर की शाम जमुई में दो नाबालिग छात्र-छात्राओं के साथ कथित बदसलूकी का मामला सामने आया। घटना का वीडियो बनाया गया और बाद में वह सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया गया। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर SIT गठित की और आरोपियों की पहचान व गिरफ्तारी की कार्रवाई शुरू की।
हमें ‘सोशल मीडिया’ नहीं, ‘सोशल सेंस’ चाहिए!
सोशल मीडिया ने मोबाइल फोन के जरिए दुनिया को हमारी हथेली में ला दिया है। कोई घटना कहीं घटती है और कुछ ही सेकंड में उसकी तस्वीर या वीडियो लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच जाता है। सूचना, संवाद और जागरूकता के इस दौर में सोशल मीडिया एक बड़ी ताकत बन चुका है।
लेकिन, बिहार के जमुई की घटना हमें इस ताकत के दूसरे और बेहद चिंताजनक पहलू पर सोचने के लिए मजबूर करती है। क्या सोशल मीडिया से जुड़ते-जुड़ते हम सामाजिक रूप से दूर होते जा रहे हैं?
बीते 19 सितंबर की शाम जमुई में दो नाबालिग छात्र-छात्राओं के साथ कथित बदसलूकी का मामला सामने आया। घटना का वीडियो बनाया गया और बाद में वह सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया गया। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर SIT गठित की और आरोपियों की पहचान व गिरफ्तारी की कार्रवाई शुरू की।
लेकिन, इस घटना की सबसे गंभीर तस्वीर सिर्फ सड़क पर हुई बदसलूकी नहीं है। उसके बाद सोशल मीडिया पर उस वीडियो का प्रसार भी हमारे सामाजिक चरित्र पर सवाल खड़ा करता है। बिहार पुलिस ने पीड़ित बच्चे-बच्चियों की पहचान उजागर करने वाले वीडियो को फैलाने वाले करीब 120 सोशल मीडिया प्रोफाइल को चिह्नित किया है। यानी जिस तकनीक का इस्तेमाल अपराध को सामने लाने और न्याय की मांग करने के लिए हो सकता था, उसी तकनीक ने पीड़ित की निजता और गरिमा को और खतरे में डाल दिया।
वीडियो बनाना आसान, तो मदद के लिए हाथ बढ़ाना मुश्किल क्यों?
जब किसी के साथ गलत हो रहा हो तो हमारा पहला कदम क्या होना चाहिए- पॉकेट से मोबाइल निकालकर वीडियो बनाना या मदद के लिए हाथ बढ़ाना?
आज किसी घटना को देखकर मोबाइल निकालना बेहद आसान है। कैमरा ऑन होता है, रिकॉर्डिंग शुरू होती है और कुछ ही क्षणों में वीडियो व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, फेसबुक या एक्स पर पहुंच सकता है।
लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि कैमरे के उस पार खड़ा व्यक्ति भी एक इंसान है? उसकी इज्जत, निजता, भय, परिवार और भविष्य भी है। किसी पीड़ित की मजबूरी को मनोरंजन का कंटेंट बना देना संवेदनशील समाज की पहचान नहीं हो सकती।
‘वायरल’ होने की भूख कहीं संवेदना को तो नहीं खा रही?
सोशल मीडिया पर ज्यादा व्यूज, लाइक, शेयर और कमेंट के चक्कर में कभी-कभी हम यह भूल जाते हैं कि हर वायरल वीडियो सिर्फ कंटेंट नहीं होता। उसके पीछे किसी की जिंदगी हो सकती है। जमुई जैसी किसी भी घटना का वीडियो शेयर करने वाला व्यक्ति शायद यह सोचकर शेयर करे कि वह घटना के खिलाफ आवाज उठा रहा है। लेकिन यदि उसी शेयर से पीड़िता की पहचान उजागर हो जाए, उसकी तस्वीर हजारों लोगों तक पहुंच जाए या उसे बार-बार उसी घटना को झेलना पड़े तो हमारा ‘शेयर’ मदद नहीं, बल्कि सामने वाले के लिए बड़ा संकट बन पैदा कर सकता है।
इसलिए जरूरी है कि हम सोशल मीडिया यूजर से पहले संवेदनशील नागरिक बनें। सोशल मीडिया अदालत नहीं है। किसी अपराध की सूचना देना और अपराध का फैसला सुनाना, दोनों अलग बातें हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल कर किसी व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक करना, व्यक्तिगत जानकारी फैलाना या भीड़ की तरह किसी के खिलाफ अभियान चलाना कभी भी न्याय प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता है। कानून अपना काम करेगा। समाज का काम है-सही सूचना देना, पीड़ित की मदद करना और अफवाह या आपत्तिजनक सामग्री को आगे फैलने से रोकना।
एक जिम्मेदार सोशल मीडिया यूजर को क्या करना चाहिए?
अगली बार आपके सामने कोई संवेदनशील घटना का वीडियो आए तो सिर्फ तीन सेकंड रुक कर सोचिए! क्या इसे शेयर करने से किसी की मदद होगी या किसी की जिंदगी और मुश्किल हो सकती है? अगर वीडियो में किसी पीड़ित की पहचान, विशेषकर किसी बच्चे या महिला की पहचान उजागर हो रही है, तो उसे आगे न बढ़ाएं।
अगर कोई वास्तविक अपराध सामने आता है तो क्या करें?
संबंधित पुलिस या प्रशासन को सूचना दें।
जरूरतमंद व्यक्ति की सुरक्षित मदद करें।
वीडियो को सनसनी बनाने के बजाय प्रमाण के रूप में अधिकृत एजेंसी को दें।
पीड़ित की पहचान और निजता की रक्षा करें।
अफवाह और अपुष्ट जानकारी को आगे न बढ़ाएं।
कमेंट करने से पहले यह सोचें कि आपके शब्द किसी पीड़ित को और चोट तो नहीं पहुंचाएंगे।तकनीक बुरी नहीं है। सोशल मीडिया भी बुरा नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब तकनीक हमारे हाथ में रहती है लेकिन संवेदना हमारे भीतर नहीं रहती। एक स्मार्टफोन हमें दुनिया से जोड़ सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह हमें इंसान से भी जोड़े। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल यह न सिखाएं कि सोशल मीडिया कैसे इस्तेमाल करना है, बल्कि यह भी सिखाएं कि सोशल मीडिया पर इंसानियत कैसे बचाए रखनी है।
किसी दुर्घटना में मदद के लिए आगे बढ़ना भी ‘कंटेंट’ है, लेकिन कैमरे के लिए नहीं, इंसानियत के लिए। किसी पीड़ित की पहचान छिपाना भी ‘वायरल मैसेज’ से ज्यादा महत्वपूर्ण है। किसी अफवाह को रोक देना भी एक सामाजिक जिम्मेदारी है और किसी गलत घटना का वीडियो शेयर करने के बजाय पुलिस को सूचना देना, शायद आज के दौर की सबसे बड़ी डिजिटल जिम्मेदारी है।
आइए, सोशल मीडिया पर सिर्फ ‘सोशल’ न दिखें-वास्तव में ‘सोशल’ बनें।
मोबाइल की स्क्रीन पर उंगली चलाने से पहले दिल में संवेदना जगाएं, वीडियो बनाने से पहले मदद करें, शेयर करने से पहले सोचें, कमेंट करने से पहले समझें और किसी भी कंटेंट को वायरल करने से पहले याद रखें- स्क्रीन के उस पार भी किसी की जिंदगी है। जमुई की घटना सिर्फ एक खबर नहीं है, यह हमारे समाज के लिए एक आईना है।
सवाल यह नहीं कि वीडियो कितने लोगों ने देखा बल्कि सवाल यह है कि देखने के बाद कितने लोग संवेदनशील बने?बड़ा सवाल- क्या #SocialMedia के चक्कर में हम #UnSocial होते जा रहे हैं?
#SocialMedia का इस्तेमाल करें,
#Humanity को #UnSocial न होने दें।
#Jamui #JamuiPolice— Santosh Kumar Tiwari (@sktjourno) September 22, 2026
लेकिन इस घटना की सबसे गंभीर तस्वीर सिर्फ सड़क पर हुई बदसलूकी नहीं है। उसके बाद सोशल मीडिया पर उस वीडियो का प्रसार भी हमारे सामाजिक चरित्र पर सवाल खड़ा करता है। बिहार पुलिस ने पीड़ित बच्चे-बच्चियों की पहचान उजागर करने वाले वीडियो को फैलाने वाले करीब 120 सोशल मीडिया प्रोफाइल को चिह्नित किया है। यानी जिस तकनीक का इस्तेमाल अपराध को सामने लाने और न्याय की मांग करने के लिए हो सकता था, उसी तकनीक ने पीड़ित की निजता और गरिमा को और खतरे में डाल दिया।
वीडियो बनाना आसान तो मदद के लिए हाथ बढ़ाना मुश्किल क्यों?
जब किसी के साथ गलत हो रहा हो तो हमारा पहला कदम क्या होना चाहिए- पॉकेट से मोबाइल निकालकर वीडियो बनाना या मदद के लिए हाथ बढ़ाना? आज किसी घटना को देखकर मोबाइल निकालना बेहद आसान है। कैमरा ऑन होता है, रिकॉर्डिंग शुरू होती है और कुछ ही क्षणों में वीडियो व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, फेसबुक या एक्स पर पहुंच सकता है।
लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि कैमरे के उस पार खड़ा व्यक्ति भी एक इंसान है? उसकी इज्जत, निजता, भय, परिवार और भविष्य भी है। किसी पीड़ित की मजबूरी को मनोरंजन का कंटेंट बना देना संवेदनशील समाज की पहचान नहीं हो सकती।
‘वायरल’ होने की भूख कहीं संवेदना को तो नहीं खा रही?
सोशल मीडिया पर ज्यादा व्यूज, लाइक, शेयर और कमेंट के चक्कर में कभी-कभी हम यह भूल जाते हैं कि हर वायरल वीडियो सिर्फ कंटेंट नहीं होता। उसके पीछे किसी की जिंदगी हो सकती है। जमुई जैसी किसी भी घटना का वीडियो शेयर करने वाला व्यक्ति शायद यह सोचकर शेयर करे कि वह घटना के खिलाफ आवाज उठा रहा है लेकिन यदि उसी शेयर से पीड़िता की पहचान उजागर हो जाए, उसकी तस्वीर हजारों लोगों तक पहुंच जाए या उसे बार-बार उसी घटना को झेलना पड़े तो हमारा ‘शेयर’ मदद नहीं बल्कि सामने वाले के लिए बड़ा संकट बन पैदा कर सकता है इसलिए जरूरी है कि हम सोशल मीडिया यूजर से पहले संवेदनशील नागरिक बनें।
सोशल मीडिया अदालत नहीं है। किसी अपराध की सूचना देना और अपराध का फैसला सुनाना, दोनों अलग बातें हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल कर किसी व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक करना, व्यक्तिगत जानकारी फैलाना या भीड़ की तरह किसी के खिलाफ अभियान चलाना कभी भी न्याय प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता है। कानून अपना काम करेगा। समाज का काम है-सही सूचना देना, पीड़ित की मदद करना और अफवाह या आपत्तिजनक सामग्री को आगे फैलने से रोकना।
एक जिम्मेदार सोशल मीडिया यूजर को क्या करना चाहिए?
अगली बार आपके सामने कोई संवेदनशील घटना का वीडियो आए तो सिर्फ तीन सेकंड रुक कर सोचिए! क्या इसे शेयर करने से किसी की मदद होगी या किसी की जिंदगी और मुश्किल हो सकती है? अगर वीडियो में किसी पीड़ित की पहचान, विशेषकर किसी बच्चे या महिला की पहचान उजागर हो रही है, तो उसे आगे न बढ़ाएं।
अगर कोई वास्तविक अपराध सामने आता है तो क्या करें?
- संबंधित पुलिस या प्रशासन को सूचना दें।
- जरूरतमंद व्यक्ति की सुरक्षित मदद करें।
- वीडियो को सनसनी बनाने के बजाय प्रमाण के रूप में अधिकृत एजेंसी को दें।
- पीड़ित की पहचान और निजता की रक्षा करें।
- अफवाह और अपुष्ट जानकारी को आगे न बढ़ाएं।
- कमेंट करने से पहले यह सोचें कि आपके शब्द किसी पीड़ित को और चोट तो नहीं पहुंचाएंगे।
तकनीक बुरी नहीं है। सोशल मीडिया भी बुरा नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब तकनीक हमारे हाथ में रहती है लेकिन संवेदना हमारे भीतर नहीं रहती। एक स्मार्टफोन हमें दुनिया से जोड़ सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह हमें इंसान से भी जोड़े। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल यह न सिखाएं कि सोशल मीडिया कैसे इस्तेमाल करना है, बल्कि यह भी सिखाएं कि सोशल मीडिया पर इंसानियत कैसे बचाए रखनी है।
किसी दुर्घटना में मदद के लिए आगे बढ़ना भी ‘कंटेंट’ है, लेकिन कैमरे के लिए नहीं, इंसानियत के लिए। किसी पीड़ित की पहचान छिपाना भी ‘वायरल मैसेज’ से ज्यादा महत्वपूर्ण है। किसी अफवाह को रोक देना भी एक सामाजिक जिम्मेदारी है और किसी गलत घटना का वीडियो शेयर करने के बजाय पुलिस को सूचना देना, शायद आज के दौर की सबसे बड़ी डिजिटल जिम्मेदारी है।
आइए, सोशल मीडिया पर सिर्फ ‘सोशल’ न दिखें-वास्तव में ‘सोशल’ बनें।
मोबाइल की स्क्रीन पर उंगली चलाने से पहले दिल में संवेदना जगाएं, वीडियो बनाने से पहले मदद करें, शेयर करने से पहले सोचें, कमेंट करने से पहले समझें और किसी भी कंटेंट को वायरल करने से पहले याद रखें- स्क्रीन के उस पार भी किसी की जिंदगी है। जमुई की घटना सिर्फ एक खबर नहीं है, यह हमारे समाज के लिए एक आईना है। सवाल यह नहीं कि वीडियो कितने लोगों ने देखा बल्कि सवाल यह है कि देखने के बाद कितने लोग संवेदनशील बने?
बड़ा सवाल- क्या #SocialMedia के चक्कर में हम #UnSocial होते जा रहे हैं?
