विधान परिषद चुनाव में गायब हैं नैतिक सवालों के जवाब : राजेन्द्र पाठक

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BHOJPUR : बक्सर स्थानीय प्राधिकारी स्तर के एमएलसी चुनाव का माहौल इनदिनों चरम पर तो है लेकिन इस चुनाव में नैतिक सवालों के जवाब, हर धड़े की तरफ से गायब हैं और यह चुनाव मात्र निजी हित और लाभ या स्वार्थ की पूर्ति के आधार पर पूरा करने की घेराबंदी सभी मिलकर कर रहे हैं। इस वजह से नगर निकाय अथवा त्रि-स्तरीय पंचायत प्रणाली के हित की चिंता और चर्चा चुनावी माहौल मे घोड़े के सींग की तरह गायब है और हावी हैं तो बस जातीय-दलगत मुद्दे और वोट का जुगाड़ बैठाने की दलाली माइंडेड नेतागिरी।

ये बातें बीते तरारी विधानसभा चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे राजेन्द्र पाठक ने कहीं हैं। उन्होंने जारी एमएलसी चुनाव के राजनीतिक वातावरण पर कई सवाल खड़े किए हैं। पाठक ने जारी एमएलसी चुनाव के उम्मीदवारों और वोटरों सहित समझदार लोगों के समाने कुछ सवाल रहते हुए इसे महज जोड़ तोड़ से रिजल्ट लेने और नगर और पंचायत प्राधिकारों के मूल मुद्दे से दूर होता काम और कदम बताया है।

राजेंद्र पाठक ने कहा है कि सबसे पहले तो इस चुनाव के मतदाता ही वाजिब मुद्दे का सवाल भूल रहे हैं और उम्मीदवार तो उन्हें वाजिब मुद्दे पर लाना चाहते ही नहीं जिसकारण पूरा चुनावी माहौल व्यक्तिगत चाहत और उसकी पूर्ति के दायरे में डूबा हुआ दिख रहा है जबकि इस चुनाव के मतदाताओं को कुछ महीने बाद ही अपने चुनाव में भी जाना है।

दूसरी बात यह कि एनडीए और महागठबंधन की उम्मीदवारी में उनकी जबरदस्त दुतरफा जातीय समीकरणों की वे बातें इस चुनावी चर्चे में हैं जिनका इस प्राधिकारी चुनाव में कोई मतलब नहीं होना चाहिए और तीसरी बात यह कि दोनों तरफ के कुछ बड़े नेता और चुने हुए प्रतिनिधि अपनी अपनी पार्टी लाइन के विपरीत भीतरी तौर पर किसी अन्य को जिताने की चाल चलने के आरोपी भी बनते जा रहे हैं जो दलीय नैतिकता के विपरीत है। साथ ही किसी को उम्मीदवारी का भरोसा देकर उसका भरोसा तोडना भी इस चुनाव का एक दोतरफा टेंशन बन रहा है।

राजेंद्र पाठक ने अपने जारी बयान से इस प्राधिकारी एमएलसी चुनाव से जुड़े या रुचि रखनेवाले लोगों से यह अपील की है कि कम प्रतिशत में ही सही पर जारी चुनाव के वाजिब मुद्दों को बचाये रखना लोकतांत्रिक और नैतिक दायित्व सहित जनहित जरुरत की बात है। पाठक ने यह भी चेताया है कि चुनाव तो जीतकर जीतनेवाला निकल जायेगा पर इसके मतदाताओं की हकीकत की बातें भी आम लोगों के बीच जाने से नहीं बचेंगी, वह इसलिए कि उन्हें अपने किये चुनावी आचरण के अनुसार ही चन्द महीनों के अंदर पंचायत चुनाव के वोटरों के समाने भी जाना तय है।

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